Kahaniya Hindi भक्ति कहानियां
Kahaniya बात उन दिनों कि है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ चल रहा था. श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के नेतृत्व में असंख्य वीरों की सेना सारे प्रदेश पर जीत करती जा रही थी.
यज्ञ का अश्व प्रदेश प्रदेश जा रहा था. इस क्रम में कई राजाओं के द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन्हें झुकना पड़ा. शत्रुघ्न के अलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भरत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था.
कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोडा देवपुर पहुंचा जहाँ राजा वीरमणि का राज्य था. राजा वीरमणि अति धर्मनिष्ठ तथा श्रीराम एवं महादेव के अनन्य भक्त थे.
उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे. राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह भी एक महारथी थे. राजा वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान दिया था. महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था.
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जब अश्व उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया और अयोध्या के सैनिकों से कहा कि यज्ञ का घोडा उनके पास है इसलिए वे जाकर शत्रुघ्न से कहें कि विधिवत युद्ध कर वो अपना अश्व छुड़ा लें. जब रुक्मांगद ने ये सूचना अपने पिता को दी तो वो बड़े चिंतित हुए और अपने पुत्र से कहा की अनजाने में तुमने श्रीराम के यज्ञ का घोडा पकड़ लिया है.
श्रीराम शंकर युद्ध
श्रीराम हमारे मित्र हैं और उनसे शत्रुता करने का कोई औचित्य नहीं है इसलिए तुम यज्ञ का घोडा वापस लौटा आओ. इसपर रुक्मांगद ने कहा कि हे पिताश्री, मैंने तो उन्हें युद्ध की चुनौती भी दे दी है अतः अब उन्हें बिना युद्ध के अश्व लौटना हमारा और उनका दोनों का अपमान होगा.
अब तो जो हो गया है उसे बदला नहीं जा सकता इसलिए आप मुझे युद्ध की आज्ञा दें. पुत्र की बात सुनकर वीरमणि ने उसे सेना सुसज्जित करने की आज्ञा दे दी. राजा वीरमणि अपने भाई वीरसिंह और अपने दोनों पुत्र रुक्मांगद और शुभांगद के साथ विशाल सेना ले कर युद्ध क्षेत्र में आ गए.
इधर जब शत्रुघ्न को सूचना मिली कि उनके यज्ञ का घोडा बंदी बना लिया गया है तो वो बहुत क्रोधित हुए एवं अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध के लिए युद्ध क्षेत्र में आ गए.
उन्होंने पूछा की उनकी सेना से कौन अश्व को छुड़ाएगा तो भरत पुत्र पुष्कल ने कहा कि तातश्री, आप चिंता न करें. आपके आशीर्वाद और श्रीराम के प्रताप से मैं आज ही इन सभी योद्धाओं को मार कर अश्व को मुक्त करता हूँ.
वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे कि पवनसुत हनुमान ने कहा कि राजा वीरमणि के राज्य पर आक्रमण करना स्वयं परमपिता ब्रम्हा के लिए भी कठिन है क्योंकि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है.
अतः उचित यही होगा कि पहले हमें बातचीत द्वारा राजा वीरमणि को समझाना चाहिए और अगर हम न समझा पाए तो हमें श्रीराम को सूचित करना चाहिए.
राजा वीरमणि श्रीराम का बहुत आदर करते हैं इसलिये वे उनकी बात नहीं टाल पाएंगे. हनुमान की बात सुन कर श्री शत्रुघ्न बोले की हमारे रहते अगर श्रीराम को युद्ध भूमि में आना पड़े, ये हमारे लिए अत्यंत लज्जा की बात है. अब जो भी हो हमें युद्ध तो करना ही पड़ेगा. ये कहकर वे सेना सहित युद्धभूमि में पहुच गए.
भयानक युद्ध छिड़ गया. भरत पुत्र पुष्कल सीधा जाकर राजा वीरमणि से भिड गया. दोनों अतुलनीय वीर थे. वे दोनों तरह तरह के शस्त्रों का प्रयोग करते हुए युद्ध करने लगे.
हनुमान राजा वीरमणि के भाई महापराक्रमी वीरसिंह से युद्ध करने लगे. रुक्मांगद और शुभांगद ने शत्रुघ्न पर धावा बोल दिया. पुष्कल और वीरमणि में बड़ा घमासान युद्ध हुआ.
अंत में पुष्कल ने वीरमणि पर आठ नाराच बाणों से वार किया. इस वार को राजा वीरमणि सह नहीं पाए और मुर्छित होकर अपने रथ पर गिर पड़े.
वीरसिंह ने हनुमान पर कई अस्त्रों का प्रयोग किया पर उन्हें कोई हानि न पहुंचा सके. हनुमान ने एक विकट पेड़ से वीरसिंह पर वार किया इससे वीरसिंह रक्तवमन करते हुए मूर्छित हो गए.
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उधर श्रीशत्रुघ्न और राजा वीरमणि के पुत्रों में असाधारण युद्ध चल रहा था. अंत में कोई चारा न देख कर शत्रुघ्न ने दोनों भाइयों को नागपाश में बाँध लिया.
अपनी विजय देख कर शत्रुघ्न की सेना के सभी वीर सिंहनाद करने लगे. उधर राजा वीरमणि की मूर्छा दूर हुई तो उन्होंने देखा कि उनकी सेना हार के कगार पर है. ये देख कर उन्होंने भगवान रूद्र का स्मरण किया.
महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जान कर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणों को युद्ध क्षेत्र में भेज दिया. महाकाल के सारे अनुचर उनकी जयजयकार करते हुए अयोध्या की सेना पर टूट पड़े.
शत्रुघ्न, हनुमान और सारे लोगों को लगा कि जैसे प्रलय आ गया हो. जब उन्होंने भयानक मुख वाले रुद्रावतार वीरभद्र, नंदी, भृंगी सहित महादेव की सेना देखी तो सारे सैनिक भय से कांप उठे.
शत्रुघ्न ने हनुमान से कहा कि जिस वीरभद्र ने बात ही बात में दक्ष प्रजापति का मस्तक काट डाला था और जो तेज और समता में स्वयं महाकाल के समान है उसे युद्ध में कैसे हराया जा सकता है. ये सुनकर पुष्कल ने कहा की हे तातश्री, आप दुखी मत हों. अब तो जो भी हो, हमें युद्ध तो करना हीं पड़ेगा.
ये कहते हुए पुष्कल वीरभद्र से, हनुमान नंदी से और शत्रुघ्न भृंगी से जा भिड़े. पुष्कल ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग वीरभद्र पर कर दिया लेकिन वीरभद्र ने बात ही बात में उसे काट दिया. उन्होंने पुष्कल से कहा की हे बालक, अभी तुम्हारी आयु मृत्यु को प्राप्त होने की नहीं हुई है इसलिए युद्ध क्षेत्र से हट जाओ.
उसी समय पुष्कल ने वीरभद्र पर शक्ति से प्रहार किया जो सीधे उनके मर्मस्थान पर जाकर लगा. इसके बाद वीरभद्र ने क्रोध से थर्राते हुए एक त्रिशूल से पुष्कल का मस्तक काट लिया और भयानक सिंहनाद किया. उधर भृंगी आदि गणों ने शत्रुघ्न पर भयानक आक्रमण कर दिया. अंत में भृंगी ने महादेव के दिए पाश में शत्रुघ्न को बाँध दिया.
हनुमान अपनी पूरी शक्ति से नंदी से युद्ध कर रहे थे. उन दोनों ने ऐसा युद्ध किया जैसा पहले किसी ने नहीं किया था. दोनों श्रीराम के भक्त थे और महादेव के तेज से उत्पन्न हुए थे. काफी देर लड़ने के बाद कोई और उपाय न देख कर नंदी ने शिवास्त्र का प्रयोग कर हनुमान को पराभूत कर दिया.
अयोध्या के सेना की हार देख कर राजा वीरमणि की सेना में जबरदस्त उत्साह आ गया और वे बाक़ी बचे सैनिकों पर टूट पड़े. ये देख कर हनुमान ने शत्रुघ्न से कहा कि मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी.
अब इस संकट से बचाव का एक ही उपाय है कि हम सब श्रीराम को याद करें. ऐसा सुनते ही सारे सैनिक शत्रुघ्न, पुष्कल एवं हनुमान सहित श्रीराम को याद करने लगे.
अपने भक्तों की पुकार सुन कर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए. अपने प्रभु को आया देख सभी हर्षित हो गए एवं सबको ये विश्वास हो गया कि अब हमारी विजय निश्चित है. श्रीराम के आने पर जैसे पूरी सेना में प्राण का संचार हो गया.
श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और उधर लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया. जब श्रीराम, लक्ष्मण और भरत ने देखा कि पुष्कल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ.
श्रीराम और भगवान् शंकर का भयानक युद्ध Kahaniyan
भरत तो शोक में मूर्छित हो गए. श्रीराम ने क्रोध में आकर वीरभद्र से कहा कि तुमने जिस प्रकार पुष्कल का वध किया है उसी प्रकार अब अपने जीवन का भी अंत समझो. ऐसा कहते हुए श्रीराम ने सारी सेना के साथ शिवगणों पर धावा बोल दिया.
जल्द ही उन्हें ये पता चल गया कि शिवगणों पर साधारण अस्त्र बेकार है इसलिए उन्होंने महर्षि विश्वामित्र द्वारा प्रदान किये दिव्यास्त्रों से वीरभद्र और नंदी सहित सारी सेना को विदीर्ण कर दिया.
श्रीराम के प्रताप से पार न पाते हुए सारे गणों ने एक स्वर में महादेव का आव्हान करना शुरू कर दिया. जब महादेव ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्ध क्षेत्र में प्रकट हुए.
इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए परमपिता ब्रम्हा सहित सारे देवता आकाश में स्थित हो गए. जब महाकाल ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया तो उनके तेज से श्रीराम की सारी सेना मूर्छित हो गयी. जब श्रीराम ने देखा कि स्वयं महादेव रणक्षेत्र में आये हैं तो उन्होंने शस्त्र का त्याग कर भगवान रूद्र को दंडवत प्रणाम किया एवं उनकी स्तुति की.
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उन्होंने महाकाल की स्तुति करते हुए कहा कि हे सारे बृह्मांड के स्वामी आपके ही प्रताप से मैंने महापराक्रमी रावण का वध किया, आप स्वयं ज्योतिर्लिंग में रामेश्वरम में पधारे.
हमारा जो भी बल है वो भी आपके आशीर्वाद के फलस्वरूप हीं है. ये जो अश्वमेघ यज्ञ मैंने किया है वो भी आपकी ही इच्छा से ही हो रहा है इसलिए हमपर कृपा करें और इस युद्ध का अंत करें.
ये सुन कर भगवान रूद्र बोले की हे राम, आप स्वयं विष्णु के दुसरे रूप है मेरी आपसे युद्ध करने की कोई इच्छा नहीं है फिर भी चूँकि मैंने अपने भक्त वीरमणि को उसकी रक्षा का वरदान दिया है इसलिए मैं इस युद्ध से पीछे नहीं हट सकता अतः संकोच छोड़ कर आप युद्ध करें.
श्रीराम ने इसे महाकाल की आज्ञा मान कर युद्ध करना शुरू किया.
युद्ध छिड़ गया जिसे देखने देवता लोग आकाश में स्थित हो गए. श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग महाकाल पर कर दिया पर उन्हें संतुष्ट नहीं कर सके.
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अंत में उन्होंने पाशुपतास्त्र का संधान किया और भगवान शिव से बोले की हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है कि आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता, इसलिए हे महादेव आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर हीं करता हूँ.
ये कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया. वो अस्त्र सीधा महादेव के हृदयस्थल में समां गया और भगवान रूद्र इससे संतुष्ट हो गए. उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वर मांग लें.
इसपर श्रीराम ने कहा कि हे भगवान यहाँ इस युद्ध क्षेत्र में भ्राता भरत के पुत्र पुष्कल के साथ असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, उन्हें कृपया जीवन दान दीजिये.
महादेव ने मुस्कुराते हुए तथास्तु कहा और पुष्कल समेत दोनों ओर के सारे योद्धाओं को जीवित कर दिया. इसके बाद उनकी आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का घोडा श्रीराम को लौटा दिया और अपना राज्य रुक्मांगद को सौंप कर वे भी शत्रुघ्न के साथ आगे चल दिए.”
Kahaniyan Bataiye आखिर भगवान् ने रामू को दर्शन क्यों दिया?
यह भक्ति कहानी मुझे मेरे दादा ने सुनाई थी… जिसे मैं आप लाेगाें से साझा कर रहा हूँ.. उम्मीद है कहानी बढ़िया लगेगी…
एक कुटी में एक साधू रहते थे… वे पूरे मनोभाव से श्रीराम, जानकी, लक्ष्मण,हनुमान जी की पूजा करते थे़… उन्हे भाग लगाने के बाद खुद भाेजन करते, यह उनका नित्यकर्म था.
मन्दिर में आये दान दक्षिणा से उनका गुजारा हाे जाता था… वैसे भी एक साधु काे धन की क्या लालसा….बस उतना मिल जाये जिससे उनका गुजारा हाे जाये.
एक बार उस कुटी में एक गरीब बेसहारा मनुष्य आ पहुंचा… उसने साधू से उस कुटी में रहने का आग्रह किया… साधू ने उसे अपनी बेबसी बताई कि किसी तरह प्रभु कि कृपा से उनका पेट भर जाता है… और दूसरे काे आश्रय कैसे दिया जा सकता है.
ताे उस मनुष्य ने कहा कि जाे कुछ रूखा सूखा रहेगा वह खा लेगा… बदले मे वह कुछ काम भी कर देगा. साधू की भी उम्र अधिक हाे गयी थी… अकेले रहने पर वे कही किसी तीर्थ पर भी नही जा पाते थे… ताे इसे भगवान की इच्छा मानकर उसे रख लिया… उस मनुष्य का नाम रामू था.
उसके आने के बाद दान थाेड़ा जादा आने लगा… सब कुछ अच्छा चलने लगा… रामू पूरी तन्मयता से साधू की सेवा करता… साधू ने मान लिया कि यह प्रभु इच्छा ही थी.
एक दिन साधू ने रामू से कहा कि रामू अब मै कुछ दिनाे के लिये तीर्थाटन पर जाने की साेच रहा हूँ… मेरे गैरमाैजूदगी मे सब कार्य बढ़िया से करना… और ध्यान रहे बिना प्रभु काे भाेग लगाये भाेजन मत करना.. यह तुम्हारे गुरू का आदेश है.
रामू ने कहा कि आपने जैसा कहा वैसा ही हाेगा… आप निश्चिंत हाेकर तीर्थाटन काे जाइये… साधू महाराज चले गए… अब तक रामू केवल भाेजन बनाता था, लकड़िया इकठ्ठी करता, साफ सफाई करता… लेकिन अब सारा कार्य उसे ही करना था..
साे वह सुबह उठ कर नित्यकर्म से निवृत्ति हाेकर अपने काम मे लग गया… उसने भाेजन बनाकर, पूजा पाठ करने के बाद थाली में भाेजन लगाकर प्रभु के पास रख दिया और हाथ जाेड़कर विनतीपूर्वक आग्रह किया कि हे परमेश्वर मेरे गुरू तीर्थस्थान काे गये है.. कृपया आयें और भाेजन ग्रहण करें.
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फिर क्या भगवान आते ताे थे नही जाे आयें.. वाे ताे एक मान्यता स्वरूप प्रभु काे भाेग लगाया जाता था.. यह बात रामू काे पता नही थी… उसे बस यही पता था कि गुरूदेव ने कहा है पहले प्रभु काे भाेग लगाकर ही भाेजन करना है.
वह हाथ जाेड़कर विनंती किया कि हे प्रभु भाेजन कर लें.. नही ताे आप दुबले हाे जायेंगे ताे गुरूजी मुझे बहुत डाटेंगे… लेकिन काेई आता ही न था ताे कैसे आये.
उसने फिर कहा ठीक है आप मेरे सामने शरमा रहे हैं.. ताे मै बाहर जाता हूँ.. भाेजन करिये.. मै बाद में आता हूँ.. ..उसने आकर देखा ताे भाेजन वैसे ही रखा था.
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उसने हाथ जाेड़ा और कहा कि हे परमेश्वर मेरे गुरू ने कहा है कि भाेग लगाकर ही भाेजन करना है… प्रभु मै गुरू के आदेश का उलंघन नही कर सकता… हे प्रभु जब तक आप भाेजन नही करेंगे मैं भी भाेजन ग्रहण नही करूंगा.
इसी तरह से 10 दिन बीत गये..रामू राेज भाेग लगाता… इंतजार करता… लेकिन काेई नही आया.. अब रामू के सब्र का बांध टूट गया… वह नादान था ही.
उसे इस बात की चिढ़ थी कि भगवान गुरूजी के हाथ का भाेजन ग्रहण करते थे मेरे हाथ का क्याे नही किये… और इस बात का डर भी कि गुरूजी काे क्या जवाब देगा.
भक्त और भगवान् की कहानी Kahaniya Bataiye
11 वें दिन उसने भाेग लगाया… और प्रभु से भाेजन ग्रहण करने की विनती की… लेकिन प्रभु नही आये.. अब उसने आप देखा न ताव वही पड़े एक लठ्ठ काे उठाया और बाेला आप लाेग मुझे परेशान कर रहे 10 दिन से भूखा रखे हाे… ना खुद खाते हाे ना मै खा सकता हूं… मै गुरदेव काे क्या जवाब दूंगा…अब जल्दी आओ कहकर उसने भगवान पर लठ्ठ तान दिया.
आश्चर्य भगवान श्रीराम प्रकट हाे गये… लेकिन राजू ताे नादान ठहरा…जाे प्रभु पालनकर्ता हैं, जिनके नाम मात्र से सारे पाप कट जाते हैं.. वाे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम स्वयं उसके सामने खड़े थे और वह उन्हे बाते सुना रहा था…. उसने कहा बढ़िया है… बिना लठ्ठ के आने वाले नही थे… गुरूदेव के हाथ का भाेजन तुरंत ग्रहण कर लेते थे… मेरे हाथ का नही… बैठिये… भाेजन ग्रहण करिये.
भगवान मुस्कुराते रहे… जैसे उसकी बातें अमृत लग रही हाे… भगवान भक्त की भक्ति देखते है.. उसके निर्मल मन काे देखते हैं…. श्रीराम जी बैठे और पूरा भाेजन खा गये….रामू के लिये कुछ नही बचा… भाेजन करने के बाद भगवान राम चले गये… रामू फिर बिना भाेजन किये साे गया… लेकिन उसके मन में खुशी थी कि राम जी आये…उसने मन ही मन साेचा कि 10 दिन से भूखे साे पूरा खा गये… कल ज्यादा बनाउंगा.
अगले दिन उसने सब कार्य करके भाेग लगाया…आज उसने दाे लाेग का भाेजन बनाया था… लेकिन यह क्या आज श्रीराम जी के साथ मां सीता भी आ गयी… आज फिर उसे भूखा साेना पड़ा.
उसने मन ही मन अगले दिन और अधिक भाेजन बनाने का साेचा…. और इधर मां सीता ने राम जी से कहा हे करुनानिधान यह कैसी लीला है… आपका भक्त ताे भूखे साे रहा है.
12 दिनाे से उसने अन्न का एक दाना भी ग्रहण नही किया है… राम जी ने मुस्कुराते हुये कहा हे सीता जल्द ही हमें उसका कर्ज उतारना है… उचित समय की प्रतिक्षा करें.
अगले दिन उसने तीन लाेगाे का भाेजन बनाया और भाेग लगाया… लेकिन यह क्या आज लक्ष्मण जी भी आ गये…. आस भी उसे उपवास साेना पड़ा.
Kahaniyan in Hindi भक्ति की कहानी
अब अगले दिन उसने चार लाेंगाे का भाेजन बनाया… लेकिन अबकि हनुमान जी भी आ गये…. यह देखकर वह कुछ नही बाेला…. अब भाेजन करके चाराे लाेग जैसे ही उठ कर जाने लगे…. उसने टाेका कहा चल दिये…. इतने दिनाे से भूखा हूं… राेज भाेजन बढ़ाता हूं… राेज एक लाेग बढ़ जाते हाे…. अब चलिये बनाइये भाेजन तब पता चलेगा..कितनी मेहनत हाेती है .
एक कहावत है … भक्त के बस में हैं भगवान… अब क्या तैयारी हाेने लगी… हनुमान जी जंगल से लकड़िया लाये… राम और लखन जी अन्य सामग्री तैयार किये… मां सीता ने भाेजन बनाया…. अब यही सिलसिला राेज का हाे गया…. समय बीतते गया….एक दिन गुरूजी तीर्थाटन से वापस आये…. दाेनाे लाेगाे ने एकदूसरे का कुशल क्षेम पूछा.
Kahaniya in Hindi हिंदी की भक्तिमय कहानी
फिर गुरूजी ने पूछा काेई परेशानी ताे नही हुई ना…. भाेग प्रभु काे लगाते हाे कि नही…. अब रामू ने सारी बात बता दी… वह बाेला कि पहले ताे बहुत नखरे किये.. लेकिन अब चाराे लाेग आते हैं भाेजन बनाते… फिर मेरे साथ ही भाेजन ग्रहण करते हैं… और चले जाते हैं.
साधु काे उसकी बाताें पर तनिक भी विश्वास नही हुआ… वरन उनकाे क्रोध आया… वह क्रोधित स्वर में बाेले… मुर्ख मेरा मुझसे मिथ्यावाद कर रहा है… मुझसे हास्य कर रहा है.. तुझे शर्म नही आती.
इस पर रामू ने हाथ जाेड़कर कहा कि मै पुर्णतया सत्य कह रहा हूं… आपकाे विश्वास ना हाे ताे आप अपनी आखाें से देख लेना… अब गुरूजी वही एक जगह छिप गये.
निश्चित समय पर राेज की भांति चारे लाेग प्रभु श्री राम, मां सीता, श्री लक्ष्मण ,श्री हनुमान आये और नित्य की भांति भाेजन बनीये और ग्रहण किए… उनके ही साथ रामू ने भी भाेजन किया.
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जैसे ही चाराे लाेग जाने काे तत्पर हुये… गुरूजी आकर उनके चरणाें पर गिर पड़े… और राेते हुये बाेले ….प्रभु मेरे सेवा में क्या कमी रह गयी थी???
भगवान मुस्कुराते हुये बाेले…. यह नादान है और गुरूभक्त है…. इसकी जि़द के आगे हमें झुकना पड़ा…इसने 15 दिन तक तप किया… इसकी भक्ति इसकी निर्मल प्रेम हमें यहा खींच लाया… हम आडम्बर के नही बल्कि भाव के भूखे हैं… जाओ तुम दाेनाे का कल्याण हाे… कहकर भगवान अंतर्ध्यान हाे गये.
अब गुरू ने रामू से हाथ जाेड़कर कहा कि आज और अभी से आप इस मंदिर के प्रमुख हाे…. आपके कारण ही आज मुझे भी प्रभु के दर्शन हाे गये…. प्रभु के दर्शन मात्र से रामू काे ग्यान प्राप्त हाे गया… वह बहुत ही प्रख्यात सन्त हुये….. यही से यह कहावत चली गुरू गुड़ रह गये चेला शक्कर हाे गया.
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