Top Stories for Kids in Hindi हिंदी की कहानी
Stories for Kids in Hindi डाक्टर सिन्हा अभी सुबह का नाश्ता करने ही जा रहे थे कि उनका पर्सनल फोन बज उठा . उन्हें यह समझते देर कि कोई सीरियस केस है . उन्होंने फोन रिसीव किया .
उधर से नर्स ने घबराते हुए बोला …सर जल्दी हास्पिटल आईये …बहुत ही सीरियस केस है . हास्पिटल डाक्टर सिन्हा के घर से थोड़ी ही दूर पर है . डाक्टर सिन्हा नाश्ता करना छोड़ सीधे हास्पिटल पहुंचे .
सर कोई नवजात बच्ची को छोड़कर चला गया है ..उसकी हालत बहुत ही सीरियस है . उसे सांस लेने में परेशानी हो रही है ….नर्स ने घबराते हुए बो
तुम लोग का दिमाग कहाँ रहता है ….कैसे कोई बच्ची को छोड़कर चला गया….सिक्युरिटी कहाँ थी . पकडे क्यों नहीं …ऐसा कहने का का तो डाक्टर का बहुत मन हो रहा था , लेकिन इस समय उस बच्ची को बचाना उनके लिये ज्यादा जरुरी था.
उन्होंने जल्दी से कृतिम श्वांस लगाकर कुछ इंजेक्शन लगाया और बाहर आये …..वे बड़बड़ा रहे थे …ऐसे भला कोई अपनी बेटी को छोड़ कर जाता है क्या . शर्म नहीं आती ऐसे लोगों को . मिल जाए तो इन्हें फांसी होनी चाहिए . अपने ही बच्चों के साथ यह कैसी घृणा …वह बड़बड़ा रहे थे कि वार्ड ब्यॉय ने उन्हें बताया कि एक एक्सीडेंट का केस है .
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डाक्टर सिन्हा ने देखा तो ज्यादा चोट नहीं आई थी . घुटने में थोड़ी सी चोट लगी थी. उन्होंने मरहम पट्टी की और दवाइयां लिख कर उस बूढी महिला के साथ आई हुई दुबली सी , सांवली लड़की को दे दी .
कैसे हुआ यह ? सिन्हा जी ने उस लड़की से पूछा
डाक्टर साहब …..वह मैं सुबह पूजा के लिए फुल तोड़ने गयी थी और मां वहीँ बठी थी . तभी वह उठकर घुमने लगीं …शायद बैठे – बैठे बोर हो रही थी . तभी अचानक से गली में से एक बाइक सवार आया और दादी को टक्कर मार दी .
घर में और कौन है ? डाक्टर का अगला प्रश्न था .
कोई नहीं सर …..पिताजी बहुत पहले गुजर गए …….मामा – मामी हैं , वे १० – १५ दिन में आ जाते हैं …बाकी गाँव के लोग बहुत अच्छे हैं .
ओह ….. ये दवाइयां लिख दी है मैंने इसे ले लेना और शायद से एक्स – रे भी करवाना पड़ सकता है . सब हो जायेगा न …ओ पैसे ..
सर उसकी चिंता मत करिए …हम मैनेज कर लेंगे . कुछ पैसे जुटाए हैं …और कुछ हम एडवांस में ले लेंगे ….उस लड़की ने कहा
एडवांस में ? सिन्हा जी ने आश्चर्य से पूछा
हाँ सर …वो हम बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं …तो हम वहाँ से ले लेंगे .
ओह …वैसे बेटा नाम क्या है तुम्हारा ?
सर …कोमल
तबी उसकी मां ने कुछ हिम्मत जुटा कर कहा, ”कोमल , मुझे जरा बिठा दो, उलटी सी आ रही है.”
डाक्टर ने कोमल के साथ मिल कर उस की मां को बिठाया. अभी वह पूरी तरह बैठ भी नहीं पाई थी कि एक जोर की उबकाई के साथ उन्होंने उलटी कर दी और कोमल की नीली पोशाक उस से सन गई.
मां शर्मसार सी होती हुई बोलीं, ”माफ करना बेटी.मैं ने तो तुम्हें भी..”
उन की बात बीच में काटती हुई श्वेता बोली, ”यह तो मेरा सौभाग्य है मां कि आप की सेवा का मुझे मौका मिल रहा है.”
कोमल के कहे शब्द डाक्टर कुमार को सोच के किसी गहरे समुद्र में डुबोए चले जा रहे थे.
”डाक्टर साहब, कोई गहरी चोट तो नहीं है न,” कोमल ने रूमाल से अपने कपड़े साफ करते हुए पूछा.
नहीं बेटा …कोई ज्यादा गहरी चोट नहीं है …जल्द ही आपकी मां पूरी तरह स्वस्थ हो जायेंगी .
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डाक्टर फिर तेजी से दुसरे कमरे में पहुंचे , जहां वह बच्ची एडमिट थी . उन्होंने देखा की उस्सकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है . बल्कि हालात और भी सीरियस हो गए थे . वे बहुत ही बेचैन हो गए . वह इस सच को भी जानते थे कि बनावटी फीड में वह कमाल कहां जो मां के दूध में होता है.
डाक्टर सिन्हा दोपहर को खाने के लिए आए तो अपने दोनों मरीजों के बारे में ही सोचते रहे. बेचैनी में वह अपनी थकान भी भूल गए थे . शाम को डाक्टर कुमार वार्ड का राउंड लेने पहुंचे तो देखा कि कोमल अपनी मां को व्हील चेयर में बिठा कर सैर करा रही थी.
”दोपहर को समय पर खाना खाया था मांजी ने ?” डाक्टर सिन्हा ने कोमल से मां के बारे में पूछा.
”जी सर, जी भर कर खाया था. महीना दो महीना मां को यहां रहना पड़ जाए तो खूब मोटी हो कर जाएंगी,” श्वेता पहली बार कुछ खुल कर बोली. डाक्टर कुमार भी आज दिन में पहली बार हंसे थे.
तभी नर्स ने आकर उन्हें कुछ मैसेज दिया और डाक्टर सिन्हा वहीँ धाम से बैठ गए . वह बच्ची नहीं बाख पायी थी . हालांकि अब उन्होंने कई मौत के केसेज देखे थे , लेकिन इस मृत्य्यु ने उन्हें अन्दर से झकझोर दिया था ……. क्योंकि यह उस बच्ची की नहीं बल्कि इंसानियत की मौत थी . वे सोच रहे थे कि अगर उस बच्ची के मां – बाप मिल जाते तो उन्हें घसीट कर कोमल के पास ले जाते और बेटी की परिभाषा समझाते …..
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2- रामकृपाल महाराज बहुत ही निर्धन थे, कहने को उनका नाम रामकृपाल था लेकिन उनके उपर राम की कृपा जरा सी भी थी नहीं थी. वह निःसंतान थे.
पुश्तैनी थोड़ी सी ज़मीन थी उसी पर उन्होने फूलों की बगिया लगा रखी थी. उसी फूलों को बेचकर किसी तरह दोनों लोगों (पति-पत्नी) का गुज़ारा होता था.
रामकृपाल बहुत ही नेक दिल इंसान थे, भगवान के परम भक्त भी थे, इसीलिए लोग उन्हे प्यार से महाराज कहते थे. एक दिन रामकृपाल ने अपनी पत्नी से कहा कि ऐसे कैसे गुज़ारा होगा, फूलों को बेचकर तो खर्चा भी नहीं निकल पता है, मैं सोच रहा था कि मुझे भी कमाने शहर में जाना चाहिये, देखों रामू शहर गया थाऔर ६ महीने में ही कितना पैसा कमा लिया.
हमारे आगे-पीछे है कौन, जो कमाने जाओगे….काट जाएगी जिंदगी…उसकी पत्नी ने कहा.
पूरी जिंदगी तो फांका-मस्ती में कट गयी….सोचता हूँ..इतना कुछ कर लूं कि मरने पर किसी से कफ़न मांगने की ज़रूरत ना पड़े…रामकृपाल ने कहा.
जैसी आपकी अच्छा…उनकी पत्नी ने कहा.
उसके बाद उनकी पत्नी ने तीन रोटी, नमक, प्याज, मिर्च के साथ एक पोटली में बांधकर रामकृपाल को दे दिया और रामकृपाल भगवान का नाम लेकर शहर की ओर निकल पड़े.
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चलते-चलते शाम हो गयी, रामकृपाल भूक से परेशान हो गये. तभी उन्हें सामने एक पीपल का पेड़ दिखा, जिसकी चाहाया बहुत ही आरामदायक थी और वहां एक कुवा भी था.
रामकृपाल वहीं पर रुक गये और लोटा डोरी के माध्यम कुएँ से पानी निकाला और हाथ -मुंह धोकर वहां बैठ गये, फिर उन्होने सोचा कि भूक भी बहुत लग रही है, रास्ता भी बहुत बाकी है, कुछ खाकर पानी पी लूं, फिर आगे की यात्रा करूगा.
उन्होने खाने की पोटली खोली तो उसमें क़ायदे से तीन मोटी-मोटी रोटियाँ रखी हुई थीं. रामकृपाल ने कहा कि “एक खाऊं..दो खाऊं या तीनों खा जाऊं”..इस बात को उन्होने कई बार कहा.
उसी कुएँ के अंदर Teen Pret रहते थे.रामकृपाल की बात सुनकर वे बड़े ही असमंजस पड़ गये कि यह बला कहां से आ गयी, जो हमें खाने की बात कर रहा है. पहले प्रेत ने कहा कि तुम दोनों यहीं रूको मैं देखता हूँ कि कौन है. अगर खायेगा तो मुझे ही खायेगा…तुम लोग भाग जाना.
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नहीं…नहीं मरेंगे तो हम साथ ही मरेंगे…हम तुम्हें अकेली नहीं जाने देंगे ..बाकी प्रेतों ने कहा.
नहीं तुम लोग यहीं रहो…मैं देखता हूँ…पहले वाले pret ने कहा.
रामकृपाल अपनी ही धुन में वही रट लगाए जा रहे थे.
तभी एक pret वहाँ पहुंचा और हाथ जोड़कर बोला…महाराज हमारी जान छोड़ दो…हमारे पास जो कुछ भी है हम आपको दे रहे हैं….महाराज कृपया करके हमें छोड़ दें.
आब रामकृपाल महाराज ने सोचा कि चलो ठीक देख ही लेते हैं कि इनके पास क्या है…उसके बाद उन्होंने कहा ठीक है….हम आप सब को छोड़ देंगे लेकिन जो भी चीज आप लोग दोगे वह बहुत ही अच्छी होनी चाहिए…जिसका कुछ फायदा हो सके.
ठीक है ….उसके बाद pret ने उन्हें एक कडाही दी और कहा कि इस कडाही से आप जो कुछ मागोगे वह मिल जायेगा.
इसके बाद रामकृपाल जी अपने घर चल दिए..अब अँधेरा होने लगा था..रास्ते में रामकृपाल जी के एक परिचित का घर था. अब उन्होंने सोचा कि क्यों न यहीं पर रात बिता ली जाए, फिर सुबह घर को चलेंगे….फिर रामकृपाल जी वहाँ आये, लेकिन उस घर की मालकिन बहुत ही चालक थी उसने बातों ही बातों में सारा भेद पता कर लिया और उनकी कड़ाही को दूसरी कड़ाही से बदल दिया.
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सुबह होने पर रामकृपाल जी अपने घर की और निकले और जब वे घर पहुंचे तो उनकी पत्नी ने कहा कि बहुत जल्द आ गए, कोई परेशानी तो नहीं हुइ न.
अरे नहीं-नहीं..कोई परेशानी नहीं हुई..बल्कि एक ऐसी चीज लाया हूँ…जिससे हमारे सारे दुःख खत्म हो जायेंगे…..जा जल्दी से चूल्हा तैयार कर…रामकृपाल खुश होते हुए बोले.
पंडिताइन ने फ़टाफ़ट चुल्हा तैयार किया…अब रामकृपाल ने भगवान् का नाम लेकर कड़ाही को चूल्हे पर रखा और उससे खाना माँगा..लेकिन कड़ाही ने कुछ नहीं दिया.
अब दे भी कैसे कड़ाही तो बादल चुकी थी…..रामकृपाल ने फिर से कोशिश की लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ…..अब पंडिताइन का धैर्य जवाब दे दिया…उन्होंने बुरा भला कहते हुए कडाही फेक दी.
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ख़राब तो पंडित जी को भी लगा..वह गुस्से में फिर सी उसी कुए पर पहुंचे और फिर वही वाक्य दोहराया ..अब दूसरा प्रेत बाहर निकला..उसने कहा महाराज हमारी जान छोड़ो मेरे पास एक बटुआ है, जिससे आप जितना पैसा मागोगे वह देगा….
ठीक है..लेकिन धोका नहीं होना चाहिये नहीं तो इस बार मैं तीनों प्रेत को मार दूंगा कहकर रामकृपाल महाराज चले गए…लेकिन उन्होंने वही गलती फिर से दोहरे और नतीजा भी पहले जैसा हुआ.
इस बार भी उनका बटुआ बदल दिया गया….अब तो रामकृपाल जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया…उन्होने आव देखा न ताव…उसी क्षण कुईं कि तरफ निकले और कुये पर आकर गुस्से में आवाज लगे कि आज मैं तिनो को खा जाऊंगा.
यह सुनकर तीसरा प्रेत बाहर निकला और पूछा गुरुदेव आप यहां से सीधे अपने घर जाते हैं या फिर रास्ते में कहीं विश्राम के लिए रुकते हैं. अब रामकृपाल जी ने सारी बात बता दी.
तब उस प्रेत उन्हें एक डंडा और रस्सी देकर साडी बात समझा दी …अब रामकृपाल महाराज खुश होती हुए फिर से अपने परिचित के घर पहुंचे. वहाँ उनका खूब सेवा-सत्कार हुआ.
तब मालकिन ने जानकारी लेनी चाही तो रामकृपाल नी कहा कि इस बार कुछ खास नहीं है सुबह बता दूंगा…मालकिन ने भी जिद नहीं कि कहीं रामकृपाल गुस्से में अभी चले जाएँ तो नुक्सान हो जायेगा.
Stories for Kids in Hindi Moral
पंडिताइन ने फ़टाफ़ट चुल्हा तैयार किया…अब रामकृपाल ने भगवान् का नाम लेकर कड़ाही को चूल्हे पर रखा और उससे खाना माँगा..लेकिन कड़ाही ने कुछ नहीं दिया.
अब दे भी कैसे कड़ाही तो बदल चुकी थी…..रामकृपाल ने फिर से कोशिश की लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ…..अब पंडिताइन का धैर्य जवाब दे दिया…उन्होंने बुरा भला कहते हुए कडाही फेक दी.
ख़राब तो पंडित जी को भी लगा..वह गुस्से में फिर सी उसी कुए पर पहुंचे और फिर वही वाक्य दोहराया ..अब दूसरा प्रेत बाहर निकला..उसने कहा महाराज हमारी जान छोड़ो मेरे पास एक बटुआ है, जिससे आप जितना पैसा मागोगे वह देगा.
ठीक है..लेकिन धोका नहीं होना चाहिये नहीं तो इस बार मैं तीनों प्रेत को मार दूंगा कहकर रामकृपाल महाराज चले गए…लेकिन उन्होंने वही गलती फिर से दोहरे और नतीजा भी पहले जैसा हुआ.
इस बार भी उनका बटुआ बदल दिया गया….अब तो रामकृपाल जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया…उन्होने आव देखा न ताव…उसी क्षण कुईं कि तरफ निकले और कुये पर आकर गुस्से में आवाज लगे कि आज मैं तिनो को खा जाऊंगा.
यह सुनकर तीसरा प्रेत बाहर निकला और पूछा गुरुदेव आप यहां से सीधे अपने घर जाते हैं या फिर रास्ते में कहीं विश्राम के लिए रुकते हैं. अब रामकृपाल जी ने सारी बात बता दी.
Top 10 Stories for Kids in Hindi स्टोरी
तब उस प्रेत उन्हें एक डंडा और रस्सी देकर साडी बात समझा दी …अब रामकृपाल महाराज खुश होती हुए फिर से अपने परिचित के घर पहुंचे.
वहाँ उनका खूब सेवा-सत्कार हुआ….तब मालकिन ने जानकारी लेनी चाही तो रामकृपाल नी कहा कि इस बार कुछ खास नहीं है सुबह बता दूंगा…मालकिन ने भी जिद नहीं कि कहीं रामकृपाल गुस्से में अभी चले जाएँ तो नुक्सान हो जायेगा.
सुबह हुई तो मालकिन ने फिर से वही बात याद दिलाई…..तो रामकृपाल ने रस्सी से कहा कि रस्सी तुम किसकी हो तो रस्सी ने कहा कि जिसकी हाथ में उसकी.
तब ठीक है..इस मालकिन के घर की लोगों को बाँध लो…अब रस्सी ने सबको बांध लिया …..फिर उन्होंने डंडी से भी वैसे ही पूछा तो डंडे ने भी कहा कि जिसके हाथ में उसका…तो ठीक है…सबको ज़रा प्रसाद खिला दो…अब डंडे ने सबकी पिटाई शुरू कर दी.
मुझे क्षमा कर दो….मैं आपकी हर चीज वापस दे रही हूँ….मुझे माफ़ कर दो..उस घर कि मालकिन और अन्य लोग दर्द से कराहते हुयी बोले.
ठीक है जल्द दो…..पंडित जी ने कहा.
अब उनकी सारी चीजें मिल गयीं….उनका जीवन खुशियों से बितने लगा.
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3- Stories for Kids in Hindi पगडंडी:- राहुल उसी रास्ते से जा रहा था,जिस पर से वह राेज जाया करता था. वह बहुत ही गरीब था लेकिन था हरफनमौला. वह हमेशा सबके सुख-दुख में काम आता था.
पगडण्डी शायद आज नसीब उस पर मेहरबान थी… वह पगडंडी के रास्ते से जा रहा कि किसी चीज के पैर में चुभने की वजह से वह उछल उठा.
उसने देखा कि वह चीज मिट्टी में सनी हाेने के बावजूद चमक रही थी. उसने उसे उठाया और उसे घर के एक काेने में रख दिया. 15 दिन बाद उसी रास्ते पर एक थाेडा बड़ा सा पत्थर, यह दूर से ही चमक रहा था. आश्चर्य की बात यह थी कि उसी रास्ते से जानेवाले अन्य लाेगाें काे वह पत्थर नहीं दिखा.
अब राहुल आश्चर्य चकित हाेकर उस चमकीले पत्थर के पास पहुंचा, तभी उस पत्थर में से एक आवाज़ आयी…. इस पत्थर काे अपने घर ले जाओ.
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यह सिर्फ तुम्हारे लिये है… तुम्हारी किस्मत बदलने वाली है…. राहुल चाैंका, लेकिन हिम्मत करके उस पत्थर काे उठा लिया और घर लाकर उसे पहले वाले टुकड़े के साथ रख दिया.
रात ताे सब लाेग साेये हुये थे कि अचानक से राहुल का मां “लखिया” का नींद खुल गयी,उन्हाेने देखा कि जिस घर में राहुल ने पत्थर रखा हुआ उसमें से सात रंग की राेशनी निकल रही थी.
यह देखकर वह चाैंकते हुये राहुल के पिता “रघुराम” राे जगाया और सारी बात तेजी से बताते हुये कहा कि लगता है घर में चाेर घुस आये हैं. अरे साे जा… हमारे घर मे काैन सा “माेती” है जो चाेर आयेंगे…साे जा यह तेरा वहम है… रघुराम नींद में उंघते हुये बाेले.
उनके इस वार्तालाप से राहुल की भी नीद खुल गयी…वह उठ बैठा… उसकी मां ने उसे सारी बातें बतायीं. राहुल ने कहा ठीक है चल कर देखते है और एक माेटा डंडा लेकर उस तरफ चल दिया, जिस घर में से वह राेशनी आ रही थी.
राहुल ने हल्के से दरवाजा खाेला और देखा कि वह राेशनी उसी पत्थर से आ रही थी…जिसके आगे लालटेन का उजाला एकदम से गाैण हाे गया.
अब ताे लखिया काे यह समझते देर नहीं लगी कि यह काेई साधारण पत्थर नहीं है. उसके बाद दाेनाे जाकर साे गये…. लेकिन उनकी आंखाें में नीद कहां…. सुबह हाेते ही लखिया ने राहुल से कहा कि तुम इस छाेटे पत्थर काे “तीरथ लाला जाैहरी” काे दिखा दाे…. देखाे वह क्या बताता है.
राहुल टुकड़े काे लेकर जौहरी के पास गया…. जौहरी ने टुकड़े काे देखते ही पहचान लिया कि यह शुद्ध हीरा है…लेकिन उसने बहाना बनाते हुये कहा कि यह काेई खास पत्थर नहीं है… मैं इसका 500 रुपये दे सकता हूं.
राहुल ने कुछ नहीं कहा… उस पत्थर काे लेकर वह “अमीर चन्द्र ” नामक जौहरी के पास गया… उसने कहा कि मैं इस पत्थर का 1 लाख दूंगा…. अब ताे राहुल आश्चर्य चकित रह गया….वह टुकड़े काे लेकर घर की ओर चल दिया.
रास्ते में तीरथ लाला जौहरी मिल गये और उसने राहुल से पूछा तुमने वह पत्थर का क्या किया?
तुम जिस पत्थर का मात्र 500 रुपये दे रहे थे… उसी का अमीर चन्द्र 1 लाख रुपये दे रहा है…. लेकिन अब मैं समझ गया हूं… यह काेई साधारण पत्थर नही है… आप लाेग मुझे मुर्ख बना रहे हैं…. यह कह कर राहुल तेजी से वहां से निकल गया.
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अब तीरथ लाला जौहरी परेशान हाेने लगा. वह किसी तरह से वह टुकड़ा हासिल करना चाहता था. उसने तुरन्त सलीम खान काे फाेन किया.
जाे कि उस इलाके का एक नामी गुंडा था.
तीरथ लाला ने उसे सारी बात बतायी और कहा कि अगर वह उस पत्थर काे ला देता है ताे वह उसे उस पत्थर की कीमत में हिस्सेदार बना देगा.
ठीक है…. काम हाे जायेगा लाला…. टेन्शन नही लेने का…. सलीम ने कहा.
सलीम ने तुरन्त अपनी गाड़ी निकाली और उस तरफ निकला जिधर राहुल गया था….राहुल अभी उसी PAGDANDI पर पहुंचा था जहां वह पत्थर मिला था….तब तक सलीम भी वहां पहुंच गया.
क्याें बे बहुत चालाक बनता है… वह पत्थर मुझे अभी दे दो… नहीं ताे तेरी खैर नहीं… राहुल ने पीछे मुड़कर देखा तो सलीम खान हाथ में डंडा लेकर खड़ा था.
अब राहुल डर गया….उसे मामले काे समझते देर नहीं लगी… उसने चुपचाप वह पत्थर सलीम काे दे दिया और वह दुखी मन से वापस घर आ गया और यह सारी बात अपनी मां काे बतायी.
इधर सलीम बहुत खुश हाे गया और उस पत्थर काे एक थैले में रखकर तीरथ लाला के पास आया और ऊंची आवाज में कहा… लाला ये ले… मैं पत्थर लेकर आ गया.
क्या… कहां है पत्थर…. लाला खुशी से उछलते बाेला.
यहां…. यह कहते हुये उसने थैले में हाथ डाला…. लेकिन यह क्या पत्थर ताे सांप बन गया था…. उसने तेजी से अपना हाथ थैले में से निकाल लिया.
सांप भी बाहर निकल गया….. सलीम ने तेजी से थैले काे फेक दिया…. अब क्या… जैसे ही वह थैला नीचे गिरा….वह सांप फिर से हीरा बन गया… ऐसा कई बार हुआ…इससे दाेनाे डर गये… उन्हाेने वहां से बाहर निकलना ही मुनासिब समझा.
लेकिन यह क्या…. अब ताे चाराे तरफ नाग ही नाग नजर आने लगे ….यह देख दाेनाे बेहद ही घबरा गये… और माफी मांगने लगे…तभी एक आवाज़ गूंजी… अगर माफी ही मांगनी ताे जाकर राहुल से मांग… उसकी मां… उसके पिता से मांग…. क्या मंजूर है.
ठीक है… ठीक है… अभी हम जाते है…. लेकिन हम जाये कैसे… यहां ताे चाराे तरफ नाग ही नाग है.
रास्ता मिल जायेगा…. लेकिन तुम्हारे पीछे दाे नाग रहेंगे… अगर कहीं काेई गड़बड़ की ताे वही मारे जावाेगे.
नही… नही.. हम काेई गड़बड़ी नहीं करेंगे…. दाेनाे गिड़गिड़ाते हुये बाेले.
अचानक से रास्ता खुल जाता…. दाेनाे तेजी से राहुल के घर की तरफ भीगे.. उनके पीछे-पीछे नाग भी भीगे…. दाेनाे खेत.. क्यारियाें और PAGDANDIYON से गिरते पड़ते राहुल के घर पहुंचे…. और राहुल के पैराें पर गिरकर मांफी मांगने लगे.
तभी फिर वही आवाज गूंजी…. राहुल यह हीरा तुम्हारा है… यह तुम्हारी किस्मत बदल देगा…. लेकिन याद रहे इसका इस्तेमाल हमेशा ही सही जगह करना…. कभी भी काेई गलत काम मत करना…. इस तरह से हीरा राहुल काे मिल गया और उसकी जिन्दगी खुशहाल हाे गयी…. उसने हमेशा ही गरीबाे की भलाई की.
४-Stories for Kids in Hindi सुरेंद्र की अभी नई–नई दारोगा के पोस्ट पर पोस्टिंग हुई तीन....वह बहुत खुश था और उलझन में भी...उलझन इसलिए थी कि जिस चौक पर उसकी उसकी पोस्टिंग थी उस चेकपोस्टों से बहुत सी ग़ैरक़ानूनी गतिविधियां होती थीं.
इससे सरकार के राजस्व का बहुत नुकसान होता था और जो भी दारोगा उस चेकपोस्ट पर ईमानदारी दिखाने की कोशिश करता...उसके दूसरे ही दिन कहीं और पोस्टिंग कर दी जाती थी.
यह बात सुरेंद्र को पहले से ही बता दी गयी थी....और उसे बताने वाला उसी चेकपोस्ट का चपरासी “जुगल किशोर“ था, लेकिन उसे “चुगल किशोर“ कहना ज़्यादा ठीक होगा क्योकि वह इसी “चुगली“ की वजह से बीस साल से उसी पोस्ट पर था.
जबकि कितने दारोगा, सिपाही आए गये..लेकिन जुगल किशोर “अंगद के पांव“ की तरह उसी चेक पोस्ट पर तैनात था...उसे हटाने वाला कोई पैदा ही नहीं हुआ था.....उसे ना जाने कितनी बार पदोन्नति का लालच दिया गया , लेकिन वह कहता कि “नहीं..नहीं मै यहीं खुश हूँ.“
दरअसल वह दारोगा और सर्किल आफिसर से भी ज़्यादा कमाता था. आज सुबह ही जुगल किशोर ने सुरेंद्र से कहा कि “दारोगा साहेब आज दयाल सिंह की १५ ट्रक इस चेकपोस्ट से जाने वाली है और उसके माध्यम से कुछ प्रतिबंधित चीजोंको नेपाल भेजा जाने वाला है
लेकिन आप उसे रोकने की कोशिश मत करना...आप नये हैं इसीलिए आपको समझा रहे हैं...बहुतो ने कोशिश की...उसका अंजाम भी उन्होने भुगता...आपको भी समझा रहा हूँ“ .....यह कहकर वह हँसता हुआ चला गया.
शाम को ६ बजने वाले थे. सुरेंद्र इसी उधेड़बुन में था कि क्या करें और क्या ना करें. सुरेंद्र का मन कर रहा था कि ऐसा मौका बार–बार नही आता...ले–दे कर मामले को ख़त्म कर लिया जाए.....लेकिन उसका दिल नही मान रहा था.
उसने फिर सोचा कि दयाल जैसे लोग ही इस देश को बर्बाद कर रहे हैं. भले ही मेरी नौकरी चली जाए लेकिन इस बार इस दयाल को ऐसा सबक दूंगा कि उसने सपने में भी नही सोचा होगा.
६ बजकर ३० मिनट पर पहला ट्रक आया और चेकपोस्ट पर रुक गया कारण आगे का रास्ता अवरुद्ध था, इतने में सुरेंद्र ट्रक के पास आए और कड़क आवाज़ में ड्राइवर से बोले “क्या है इस ट्रक में“.
” ड्रायफ़ूड है ” ड्राइवर ने कहा.
ठीक है..मैं खुद चेक करूंगा...इसके बाद सुरेंद्र ने ट्रक को चेक किया तो उसमें प्रतिबंधित समान था. जिसकी कीमत १ करोड़ से ज़्यादा थी.
चलो गाड़ी को साइड में लगाओ....झूठ बोलता है....इसमें ड्रायफूड है.....सुरेंद्र ने कड़क आवाज़ में कहा.
” शायद आप नहीं जानते कि यह किसकी गाडी है” ड्राइवर ने व्यंग में मुस्कुराते हुए कहा.
“किसकी भी हो. तुम गाडी को साइड में लगाओ ” सुरेन्द्र ने उसे डांटकर कहा.
सुरेंद्र के कड़े तेवर देखकर ड्राइवर ने गाड़ी को साइड में लगा दिया..पीछे से आने वाले १४ ट्रक भी साइड में लगा दिये गये. रात के १० बज गये थे.
पूरी स्थिति को भांपकर जुगल किशोर ने पूरी बात दयाल सिंह को बता दिया....क्योंकि वह ख़ाता तो सरकार का था लेकिन गाता दयाल सिंह का था.
थोड़ी ही देर में दयाल सिंह की गाड़ी चेक पोस्ट पर आकर रुकी. दयाल सिंह के साथ २ आदमी ४ सूटकेश लेकर उतरे, दयाल सीधे दारोगा सुरेंद्र के पास गया और चारो सूटकेश उनके पास रखते हुये बोला कि दारोगा जी ये लीजिए और गाड़ी को जाने दीजिए और यह छोटा सा तोहफा स्वीकार करें और आगे ऐसे हीऐसे तोहफे मिलते रहेंगे.
गाड़ी नहीं जाएगी..दयाल सिंह...चाहे आप कुछ भी कर लें और यह तोहफा भी आप साथ ही ले जाएं...सुरेंद्र ने कड़क आवाज़ में बोला.
ठीक है...दारोगा साहब..हम तो जा रहे हैं..लेकिन २५ साल में पहली बार हमें कोई ऐसा आदमी मिला है , जिसने ऐसी हिमाकत की है.इसक इनाम आपको ज़रूर मिलेगा....कहकर दयाल सिंह वहां से चला गया.
कोई परवाह नहीं....मैं इसके लिए पहले से ही तैयार हूँ...सुरेंद्र ने कहा.
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वही हुआ जो होना था...सुबह–सुबह बड़े आफिसर का लेटर लेकर जुगल किशोर सुरेंद्र के आफ़िस में पहुंचा और उन्हें लेटर देकर तीखी मुस्कान के साथ बाहर निकल गया.
सुरेंद्र तो पहले से ही इसके लिए तैयार था. वह कुछ देर में अपने घर की लिए निकाला और घर पहुँच कर अपने पिता से इसी बात पर विचार कर रहा था कि उतने में आईजी डी पी तिवारी की गाड़ी दरवाजे के सामने आकर रुकी..वह आते ही उन्होने कहा गर्व है मुझे आप पर और आपके माता–पिता...जिन्होने आपको ऐसी शिक्षा दी...जो कि आपकी ईमानदारी को डिगा नहीं पाई.
आपकी इस ईमानदारी के वजह से कल १४ गाड़ियां पकड़ी गयी और दयाल की अमीरी भी आपको डिगा नहीं पायी/ मुझे आप पर गर्व है. मुख्यमंत्री ने खुद इस मामले को संज्ञान में लिया है.
आपका प्रमोशन करने का आदेश दिया गया है. जुगल किशोर को निलंबित कर दिया गया है...और जल्द ही दयाल सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा.....हमें इसी तरह के आफिसर की आवश्यकता है. मुझे आप पर गर्व है. उसके दयाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. पूरा इलाक़ा खुशहाल हो गया.
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