पिनाक की कथा Best Story in Hindi
Best Story in Hindi आज इस पोस्ट में महान धनुष पिनाक की कथा का वर्णन किया जा रहा है। इस वर्णन का सिर्फ एक ही मकसद है कि ऐसे पौराणिक धरोहरों के बारे में लोगो को बताना।
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया। प्रजापति दक्ष भगवान् शिव के श्वसुर थे। उन्होंने भगवान् शिव से अप्रसन्न होने के कारण उन्होंने उस यज्ञ में भगवन शिव् और अपनी पुत्री माता सती को आमंत्रित नहीं किया।
माता सती को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने भगवान् शिव से यज्ञस्थल पर जाने की अनुमति मांगी। भगवन शिव के समझाने के बाद भी वे यज्ञस्थल पर पहुँच गयीं।
वह भगवान् शिव के अपमान से बहुत आहात थीं। यज्ञस्थल पर सती का अपमान हुआ। सती ने देखा कि देवताओं के लिये यज्ञ का जो भाग निकाला गया था उसमें शिव जी का भाग था ही नहीं। इससे क्रुद्ध होकर सती ने यज्ञकुण्ड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिये।
महादेव जी गणों ने जो माता सती के साथ दक्ष के यहां गए थे, वे लौटकर महादेव शिव शंकर को सारा वृत्तांत बताया। सती की मृत्यु की सूचना पाकर भगवान् शिव बहुत क्रोधित हुए।
उन्होंने क्रोध में अपनी जटा को जमीन पर फेंककर वीरभद्र का आह्वान किया। वीरभद्र कई सारे गणों के साथ जाकर दक्ष की यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का वध कर दिया।
महादेव देवताओं से भी क्रुद्ध थे, क्योंकि उन्होंने वहाँ महादेव की अनुपस्थिति के बाद भी यज्ञ का भाग लिया था और उसका विरोध भी नहीं किया था।
भगवान् श्री विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव को ५१ भागों में विभाजित कर दिया। उनके अंग धारा पर जहां – जहां गिरे वे स्थान शक्ति पीठ कहलाये। इस तरह से कुल ५१ शक्ति पीठ हुए।
इसके बाद भगवान् श्री हरी और दूसरे देवताओं ने भगवान् शिव का क्रोध शांत कराया। क्रोध शांत होने पर भगवान् शिव कैलाश लौट आये।
भगवन शंकर ने पिनाक धनुष भगवान् परशुराम को दिया और भगवान् परशुराम जी ने इस धनुष को राजा निमि के भाई देवरात के पास रखवा दिया जो कि राजा जनक के पूर्वज थे।
पिनाक की कथा
हमारे पूर्वजों का स्मृति-चिह्न होने के कारण हम इस धनुष की देखभाल सम्मान के साथ करते आ रहे हैं। इसी बीच एक बार हमारे राज्य में अनावृष्टि के कारण सूखा पड़ गया जिससे प्रजाजनों को भयंकर कष्ट का सामना करना पड़ा।
उस कष्ट से मुक्ति पाने हेतु राजा जनक ने महा यज्ञ किया। पुरोहितों के आदेश पर उन्होंने शुभ मुहूर्त में खेत में हल चलाया। हल से भूमि खोदते – खोदते उन्हें भगवान की कृपा से एक कन्या प्राप्त हुई, जो महा तेजस्वी थी।
उस कन्या का नाम सीता रखा गया। जब सीता किशोरावस्था को प्राप्त हुई तो दूर दूर तक उसके सौन्दर्य एवं गुणों की ख्याति फैलने लगी। देश-देशान्तर के राजकुमार उसके साथ विवाह करने के लिये लालायित होने लगे।
राजा दशरथ अद्भुत पराक्रमी योद्धा के साथ ही सीता का विवाह करना चाहते थे। अतः उन्होंने यह प्रतिज्ञा कर ली कि शिव जी के धनुष पिनाक पर प्रत्यंचा चढ़ा देने वाला वीर राजकुमार ही सीता का पति होगा।
इस प्रतिज्ञा की सूचना पाकर सहस्त्रों राजकुमार, राजा – महाराजा समय – समय पर अपने बल की परिक्षा करने के लिए यहां आये किन्तु पिनाक पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर उसे तिल भर खिसका भी नहीं सके।
जब वे अपने उद्देश्य में इस प्रकार निराश हो गये तो वे सब मिलकर जनकपुरी में उत्पात मचाने लगे। जनकपुरी को चारो तरफ से घेरकर निरीह प्रजा को लूटकर आतंक मचने लगे।
तब राजर्षि ( जनक को राजर्षि भी कहा जाता है। वे राजा जरूर थे लेकिन उनका स्वभाव ऋषियों की तरह था। ) जनक अपनी सेना के साथ निरंतर उन आतताइयों से युद्ध करते रहे।
परन्तु वे अनेक राजा थे। उनके पास एक विशाल सेना थी। इसलिए उनके साथ संघर्ष में राजा जनक की सेना नष्ट होने के कारण कमजोर होने लगी।
तब उन्होंने भगवान् को सहारा मानकर उनकी तपस्या की और भगवान् ने उनकी तपस्या से प्रसन्न उन्हें देवताओं की चतुरंगिणी सेना प्रदान की। उस सेना ने आततायी राजाओं से भयंकर युद्ध किया और सभी उपद्रवी राजकुमारों को भगाया।
उनके भाग जाने के पश्चात् राजा जनक ने विचार किया कि एक विशाल यज्ञ करके इस अवसर पर ही अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँ और सीता का विवाह कर निश्चिन्त हो जाऊँ।
उसके बाद स्वयम्बर में अनेक राजा – महाराजाओं ने इस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की कोशिश की, लेकिन सभी विफल रहे। तब भगवान् श्री राम जी इस धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढाने के बाद इसे तोड़ दिया।
भगवान श्री हरि और भगवान शंकर का स्वप्न Best Story in Hindi
बात बार की बात है। भगवान् नारायण वैकुण्ठलोक में सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्न देखा कि त्रिशूल – डमरू धारी, करोड़ों चंद्रमाओं की कांति वाले भगवान् शिव प्रेम और आनन्दातिरेक से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं।
उन्हें देखकर भगवान् विष्णु हर्ष से गदगद हो उठे और अचानक उठकर बैठ गये, कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे। उन्हें इस प्रकार अचानक नीद से उठने पर माता लक्ष्मी जी ने उनसे पूछा, ” भगवन ! इस प्रकार अचानक निद्रा से उठकर बैठने का क्या कारण है?”
श्री विष्णु तो प्रथम तो कुछ नहीं बोले और आनंद में मग्न चुपचाप बैठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले, ” देवि, अभी मैंने स्वप्न में भगवान् नीलकण्ठ का दर्शन किया। उनकी उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान् शिव ने मुझे स्मरण किया है। कैलाश चलकर हमें महादेव के दर्शन करना चाहिए। ”
ऐसा विचार कर दोनों कैलाश की तरफ चल दिए। भगवान शिव के दर्शन के अभी आधे मार्ग तक पहुंचे ही होंगे कि देखते हैं भगवान शंकर स्वयं पार्वती के साथ उनकी तरफ चले आ रहे थे।
अब तो भगवान के आनंद का ठिकाना ही नहीं रहा। पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले। ऐसा लगा, मानों प्रेम और आनंद का समुद्र उमड़ पड़ा।
प्रश्नोत्तर होने पर मालुम हुआ कि शंकर जी को भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न आया है मानों विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे हैं, जिस रूप में अब उनके सामने खड़े थे।
दोनों अब -एक दूसरे को अपने निवास ले जाने का आग्रह करने लगे। भगवान श्री विष्णु ने भगवान शिव से कहा आप वैकुण्ठ चलें और भोलेनाथ कहने लगे कि कैलाश प्रस्थान किया जाए।
दोनों के आग्रह में इतना प्रेम था कि निर्णय करना कठिन हो गया कि कहाँ चला जाए? इतने में ही नारद मुनि नारायण – नारायण का गान करते हुए वहाँ आ पहुंचे।
अब क्या, दोनों लोग नारद मुनि से यह निर्णय कराने लगे कि कहा चला जाए? नारद जी बड़े परेशान। किसके तरफ फैसला करें। उनके लिए तो दोनों ही प्रिय थे।
अब निर्णय यह हुआ कि जो माता पार्वती कह देंगी वही स्वीकार होगा। भगवती पार्वती प्रथम तो कुछ क्षण चुप रहीं, फिर वे दोनों के तरफ मुख करते हुए बोलीं, ” हे नाथ, हे नारायण, आप लोगों के निश्चल और पवित्र प्रेम को देखकर यही प्रतीत होता है कि आपके निवास स्थान अलग – अलग नहीं हैं। जो कैलाश है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है। यही नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो हैं। जो आप लोगों में से किसी एक से भी द्वेष करता है, मानो वह दूसरे के प्रति भी करते हैं। उसका घोर पतन होता है। आपके बिना नारायण अधूरे हैं तो नारायण के बगैर आप। अब मेरी यही प्रार्थना है कि आप दोनों लोग ही अपने – अपने लोक को प्रस्थान करें और श्री हरि यह समझें कि वह शिव रूप में वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह माने कि वे विष्णु रूप में कैलाश प्रस्थान कर रहे हैं। ”
इस उत्तर को सुनकर दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए और भगवती पार्वती की प्रशंसा करते हुए दोनों ने एक – दूसरे को प्रणाम किया और अत्यंत ही हर्ष से अपने – अपने लोक को प्रस्थान किया।
यमराज और डाकू की कहानी Stories in Hindi
मृत्यु के पश्चात एक साधू और एक डाकू यमराज के दरबार में पहुंचे। यमराज ने बहीखातों में बारीकी से देखा और दोनों से कहा, ” तुम लोग अपने – अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो।
इसपर डाकू ने बड़े ही विनम्र शब्दों में बोला, ” महाराज ! मैंने जीवनभर पाप कर्म किये। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूँ। अतः आप जो भी दंड देंगे वह मुझे स्वीकार होगा। ”
उसके बाद साधु ने कहा, ” महाराज ! मैंने आजीवन ही प्रभु भक्ति की है। जप तप किया है। कभी भी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। सदा ही सत्कर्म किये हैं। इसलिए आप कृपा कर मुझे स्वर्ग के सुख दें। ”
यमराज ने दोनों की इच्छा को सुनने के बाद डाकू से कहा, ” तुम्हे दंड दिया जाता है कि आज से तुम साधु की सेवा करो। ” डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली।
लेकिन साधु इस पर आपत्ति करते हुए कहा, ” महाराज ! इस पापी के स्पर्श से तो मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निरर्थक हो जायेगा। ”
यह सुन यमराज जी क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा, ” निरपराध लोगों को लुटाने वाला, पापकर्म करने वाला इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने के लिए तैयार हो गैया और तुम वर्षो तप करने बावजूद भी अपने अहंकार को नष्ट नहीं कर पाए। तुम्हारी तपस्या अभी अधूरी है। अतः अब तुम इस डाकू की सेवा करो। ”
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