Hindi Kahaniya New स्यमन्तक मणि की कथा
Hindi Kahaniyan एक बार की बात है नंदकिशोर ने सनतकुमारों कि एक बार भगवान श्रीकृष्ण पर लांछन लगा था, वह सिद्धि विनायक व्रत करने से दूर हुआ।
यह सुनकर सनतकुमारों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने नंदकिशोर जी से पूछा पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण को कलंक कैसे लगा? कृपया इस कथा को बताएं।
तब नंदकिशोर जी कथा बतानी शुरू की। एक बार जरासंध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के मध्य नगरी बसाकर रहने लगे। इस नगरी को द्वारिकापुरी कहा जाता है।
द्वारिकापुरी में निवास करने वाले सत्राजित यादव ने भगवान सूर्यनारायण की आराधना की। तब भगवान शिव ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी।
इस मणि को पाकर जब सत्राजित यादव समाज में गया तो श्रीकृष्ण जी ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन सत्राजित ने वह मणि भगवान श्रीकृष्ण को ना देकर अपने भाई प्रसेनजीत को दे दी।
एक दिन प्रसेनजीत घोड़े पर चढ़ाककर शिकार के लिए गया। वहाँ एक शेर ने उसका वध कर दिया और वह मणि उससे ले ली और उस मणि को रीछराज राजा जामवंत ने शेर को मारकर उसे अपनी ले गए और उसे अपनी पुत्री जामवंती को दे दी।
जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। उसने विचार किया, ” श्रीकृष्ण ने ही मणि को प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा क्योंकि उन्हें ही यह मणि चाहिए थी। ”
शुक्ल चतुर्थी का चन्द्रमा Hindi Kahaniyan
अब उसने यह बात लोगों से कहना शुरू कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर मणि को छीन ली। भगवान श्रीकृष्ण अपने ऊपर लगे लांछन से बहुत दुखी हुए।
उन्होंने इस लांछन को निवारण करने के लिए उस मणि को ढूंढ़ने और प्रजेनजित को ढूढ़ने वन में गए। वहाँ उन्हें प्रसेनजित को शेर द्वारा मारने और उसके बाद रीछ द्वारा शेर को मारने के निशान मिले। वहीँ पर रीछ के पदचिन्ह भी मिले।
वे उस पद चिन्ह पीछा करते हुए जामवंत की गुफा तक पहुंचे और उसके भीतर चले गए। उन्होंने वहां देखा कि जामवंत की पुत्री से खेल रही थी। उन्होंने उससे उस मणि को माँगा।
तब तक वहाँ जामवंत भी पहुँच गए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध को ललकारा। दोनों के मध्य भयंकर मल्लयुद्ध होने लगा। गुफा के बाहर मौजूद भगवान श्रीकृष्ण के साथ आये साथियों ने सात दिन तक श्रीकृष्ण की।
जब वे वापस नहीं आये तो उन्हें मृत जानकार वे द्वारिकापुरी लौट गए। लगातार २१ दिन युद्ध करने के पश्चात भी जामवंत श्रीकृष्ण को हरा नहीं सके।
तब उन्हें आया, ” कहीं यह कोई अवतार तो नहीं हैं जिसके लिए मुझे भगवान रामचंद्र जी ने वरदान दिया था। ” तब उसने हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण से अपने बारे में बताने का आग्रह किया।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया, ” वे भगवान श्रीराम चंद्र के ही अवतार है। ” तब जामवंत ने उसी भगवान श्रीराम के रूप का दर्शन देने का आग्रह किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने भगवान् श्रीराम के रूप में दर्शन दिया।
उसके बाद जामवंत ने अपनी कन्या जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। जब श्रीकृष्ण मणि को लेकर वापस आये तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ।
इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। कुछ समय बाद कृष्ण भगवान इंद्रप्रस्थ गए। तब अक्रूर तथा ऋतू वर्मा की राय से शतधन्वा यादव ने सत्राजित को मारकर मणि अपने कब्जे में ले ली।
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सत्राजित की मौत का समाचार जब श्रीकृष्ण को मिला तो वे तुरंत ही द्वारिका पहुंचे। वे शतधन्वा को मारकर मणि छीनने को तैयार हो गए। इस कार्य में सहायता के बलराम जी भी तैयार हो गए।
जैसे ही यह बात शतधन्वा को पता चला उसने मणि अक्रूर को दे दी और स्वयं भाग निकला। श्रीकृष्ण ने उसका पीछा करके उसे मार तो डाला, पर मणि उन्हें नहीं मिल पाई।
बलराम जी भी वहाँ पहुंचे। श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि मणि उनके पास नहीं है। बलराम को विश्वास नहीं हुआ। वे इससे अप्रसन्न होकर विदर्भ चले गए।
श्रीकृष्ण के द्वारिका लौटने पर लोगों ने उनका भारी अपमान किया। तत्काल यह समाचार फैल गया कि स्यमन्तक मणि के लोभ में श्रीकृष्ण ने अपने भाई को भी त्याग दिया।
श्रीकृष्ण इस अकारण प्राप्त अपमान के शोक में डूबे थे कि तभी वहाँ नारद जी आ गए। उन्होंने उन्हें बताया कि आपने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चन्द्रमा का दर्शन किया। इसीलिए आपको इस तरह लांछित होना पड़ा।
कृष्ण और रुक्मिणी विवाह हिंदी कहानियां
विदर्भ देश के राजा भीष्मक के पात्र पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्री का नाम रुक्मिणी था। वह बहुत ही सुन्दर और सुशील थीं। उससे विवाह करने के लिए अनेक राजा और राजकुमार आये दिन विदर्भ की राजधानी जाते रहते थे।
उन दिनों श्रीकृष्ण के रूप – सौंदर्य और पराक्रम की गाथायें समस्त भारत में गूंज रही थी। राजकुमारी रुक्मिणी अपनी किशोरावस्था श्रीकृष्ण के बारे में सुनते आ रही थीं।
इसके कारण उनके मन में श्रीकृष्ण के लिए विशिष्ट स्थान बन गया था। जब वे बड़ी हुई तो उन्होंने अनुभव किया कि तीनों लोकों में श्रीकृष्ण से श्रेष्ठ वर उनके लिए हो ही नहीं सकता। इसलिए उन्होने उन्हें मन ही मन पति मान लिया।
रुक्मिणी के माता – पिता भी अपनी पुत्री का विवाह कृष्ण से करना चाहते थे परन्तु रुक्मिणी के बड़े भाई रुक्मी की मित्रता शिशुपाल और जरासंध जैसे उन राजाओं से थी श्रीकृष्ण से बैर रखते थे।
जब रुक्मी को यह बात पता चली कि रुक्मिणी श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती हैं और उसके माता – पिता भी इस बात से सहमत हैं तो उसने राजसभा में घोषणा कर दी कि उसकी बहन रुक्मिणी का विवाह छेदी नरेश शिशुपाल के संग होगा।
राजा भीष्मक ने इसका विरोध किया वे रुक्मी आगे विवश हो गए। रुक्मी ने अपने कुल पुरोहित से विवाह की तिथि निश्चित कराई और शिशुपाल के पास सन्देश भिजवा दिया कि वह अपने मित्र राजाओं को बरात में लेकर आये और राजकुमारी रुक्मिणी को विवाह कर ले जाए।
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जब यह बात रुक्मिणी को पता चली तो वह बहुत दुखी हुई। उन्होंने श्रीकृष्ण को मन ही मन पति स्वीकार कर लिया था। सोच – विचार कर उन्होंने एक विश्वस्त ब्राह्मण को बुलाया और उनसे पूरी बात द्वारिकाधीश द्वारिकाधीश कृष्ण से बताने को कहा और साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि वह नहीं आये तो वह अपने प्राण त्याग देंगी।
रुक्मिणी का संदेश लेकर ब्राह्मण उसी समय द्वारिका की ओर चल दिया और कुछ दिनों बाद द्वारिका में पहुंच गया। जब कृष्ण को उस ब्राह्मण द्वारा रुक्मिणी का संदेश मिला तो कृष्ण ने उसे वचन दे दिया कि भले ही शिशुपाल, जरासंध आदि राजाओं की विशाल सेनाओं से उन्हें भीषण युद्ध क्यों न करना पड़े वह उसे उन सबके बीच से उठा लाएंगे।
श्रीकृष्ण ने उसी समय अपने सारथी को रथ तैयार करने आज्ञा दी और ब्राह्मण को लेकर को रथ तैयार करने की आज्ञा दी और ब्राह्मण को साथ लेकर कुंडिनपुर की ओर चल पड़े।
श्रीकृष्ण के जाते ही बलराम को उनके कुण्डिनपुर प्रस्थान की सूचना मिल गयी। उन्होंने सेना की एक शक्तिशाली टुकड़ी के साथ इतनी तेजी से प्रस्थान किया कि वे भी कृष्ण जी के पीछे – कुण्डिनपुर पहुँच गए।
कृष्ण और बलराम के पहुँचने के पूर्व ही शिशुपाल अपने साथी राजाओं सेना के साथ कुण्डिनपुर पहुँच चुका था। जिसमें शिशुपाल के मित्र जरासंध, शाल्व, पौण्ड्रक, दंत, वकभ और विदूरथ आदि अनेक राजाओं की कई अक्षौहिणी सेना बारात में सम्मिलित थी।
विवाह के दिन सुबह परम्परा के अनुसार रुक्मिणी अपनी सहेलियों तथा अन्य महिलाओं के साथ नगर से बाहर बनाये गए मंदिर में पूजा हेतु गयीं। रुक्मिणी के सन्देश वाहक ब्राह्मण द्वारा सारी योजना तैयार की जा चुकी थी। इसलिए श्रीकृष्ण मंदिर के पीछे रथ लेकर पहुँच गए।
पूजा करने के बाद रुक्मिणी जैसे ही मंदिर से निकली कृष्ण ने उन्हें उठाकर अपने रथ में बैठा लिया। रुक्मिणी के साथ आए सैनिक देखते ही रह गए।
जब यह समाचार रुक्मी, शिशुपाल तथा अन्य को मिला तो वे अपनी विशाल सेनाओं के साथ श्रीकृष्ण को पकड़ने चल दिए। लेकिन नगर के बाहर बलराम अपनी सेना के साथ खड़े थे।
यदुवंशियों की सेना ने ने शिशुपाल, जरासंध और उनके साथी राजाओं की विशाल सेनाओं पर इतनी भयंकर बाण वर्षा की कि वे सिर पर पांव रख कर भागने लगी। अपनी सेनाओं का संहार होते और उन्हें भागते देख शिशुपाल और उसके साथी राजा भी अपने प्राण बचाकर भाग गए।
शिशुपाल और उसके साथियों के इस तरह से भागते देख रुक्मी बहुत क्रोधित हुआ। वह अकेले ही श्रीकृष्ण का पीछा करने लगा। श्रीकृष्ण उसके साथ युद्ध नहीं करना चाहते थे।
लेकिन जब रुक्मी ने अपशब्द कहते हुए उन पर आक्रमण कर दिया तो विवश होकर कृष्ण को शस्त्र उठाने पड़े| उन्होंने पलक झपकते ही रुक्मी के रथ के घोड़ों और सारथी को मार डाला।
रुक्मी भी इसमें घायल हो गया। उसी के उत्तरीय से उसके हाथ-पैर बांधने के बाद उसके सिर तथा दाढ़ी-मूछों के बाल जगह-जगह से मूंडकर उसे कुरूप बना दिया।
रुक्मी यह प्रतिज्ञा करके श्रीकृष्ण से युद्ध करने गया था कि अगर वह अपनी बहन रुक्मिणी को नहीं छुड़ा सका तो कुण्डिनपुर में नहीं आएगा। जब बलराम जी के कहने पर श्रीकृष्ण ने उसे छोड़ दिया तो वह अपने बचे हुए कुछ सैनिको के साथ एक निर्जन प्रदेशमें चला गया और वही नया नगर बसाकर रहने लगा।
उसके बाद श्रीकृष्ण, रुक्मिणी बलराम जी और उनकी सेना द्वारिका लौट आये और फिर विधि – विधान से श्री कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह संपन्न हुआ।
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