तुम्हें  क्या हासिल हुआ वह मैं नहीं जानता हूँ और ना ही जानने की अब कोई इच्छा ही बाकी रह गयी है. लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ और दावे के साथ कह सकता हूं कि तुमने उस शख्स को खोया है जो तुम्हें खुद से भी ज्यादा प्यार करता था और शायद है भी.

 

 

 

चलो जाने दो तुम्हें जो अच्छा लगा वह तुमने किया. कोई बात नहीं लेकिन एक बात का ध्यान रहे खुदा के वास्ते अब मेरी ज़िन्दगी में दुबारा कभी भी दाखिल होने की कोशिश मत करना. अब  मै और सहन नहीं कर पाऊंगा.

 

 

 

दुबारा कभी भी मिलने की कोशिश भी नहीं करना …..क्योंकि जब भी मैं तुम्हें देखूंगा तो तुम्हारी यह बेवफाई मुझे याद आएगी और हो सकता है कि मैं खुद को संभाल ना सकूं.

 

 

 

उस दिन अचानक ही साक्षी की नजर रौनक के द्वारा लिखे हुए आखिरी ख़त पर पड़ी जो कि महीनो से उसकी किताब में दबा हुआ था. अब साक्षी अपने पुराने दिनों में खो गयी .

 

 

 

 

स्टोरी स्टोरी

 

 

 

 

साक्षी का कालेज का पहला दिन था. वह जैसे ही कालेज में आयी बाकी लड़कों ने उसकी रैंगिंग शुरू कर दी. उसे लंगड़ाते हुए चलने को कहा गया. साक्षी इस कालेज में नई थी . उसका कोई दोस्त भी  नहीं  था.

 

 

 

 

तब रौनक ने उसे बचाया और सारे स्टूडेंट्स को खूब डांट लगाईं. रौनक एक स्थानीय नेता का बेटा था, लेकिन वह कभी भी अपने पावर का गलत इस्तेमाल नहीं करता था.

 

 

 

समय बीता…..साक्षी और रौनक में नजदीकियां बढ़ने लगी. अब दोनो बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे. उनकी दोस्ती को देखकर बाकी स्टूडेंट्स को जलन होती थी.

 

 

 

बहुत ही ख़ूबसूरत जोड़ी थी. लेकिन शायद इस खुबसूरत जोड़ी को किसी की नजर लग गयी. पढाई पूरी होने के बाद साक्षी एक प्रतिष्ठित कंपनी में जॉब करने लगी.

 

 

 

दोनों की मुलाकाते होती रहती थी. इधर इलेक्शंस के टाइम आ गए और साक्षी के काल आने भी कम हो गए. उस दौरान रौनक ने कई बार साक्षी से  मिलने की कोशिश की, लेकिन साक्षी कोई ना कोई बहाना बनाकर मिलाने से मना कर देती.

 

 

 

इलेक्शंस खत्म हुए. रौनक के पापा की बड़ी जीत हुई. हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ ही थी, लेकिन रौनक के लिए दुखों का पहाड़ तैयार था. रौनक जीत की बात खुद बताने जब साक्षी के घर गया तो पता चला कि वे लोग यहां से जा चुके हैं. वहाँ कोई दूसरा किरायेदार आ गया था. रौनक ने पूरा शहर छान माना, लेकिन साक्षी नहीं मिली. वह जॉब भी छोड़ चुकी थी.

 

 

 

रौनक बुरी तरह टूट गया था……बहुत मुश्किलों से वह अपने आपको संभाला…..तब उसने यह चिट्ठी लिखी और रोशनी जो कि साक्षी की बेस्ट फ्रेंड थी उसके हाथों इसे भिजवा दिया…..लेकिन साक्षी ने इसे खोला नहीं बल्कि वैसे ही रख दिया.

 

 

 

यह ख़त पढ़ने के बाद साक्षी फूट-फूट कर रोने लगी….वह भी रौनक से बहुत प्यार करती थी, लेकिन उसका परिवार एक  मध्यमवर्गीय परिवार था.

 

 

 

 

 

जबकि रौनक एक प्रतिष्ठित राज नेता की फैमिली से था…..सो हर समय साक्षी के मन में  यह इस दूरी का भय लगा रहता था….और इसे वह रौनक के साथ कभी शेयर नहीं कर और इस तरह इस दर्द भरे प्यार  का अंत हो गया.

 

 

 

२- हेलो दोस्तो, मेरा नाम राकेश है. है. मैं U.P. के मेरठ का रहने वाला हूँ. वैसे तो मैं मुंबई के दादर में रहता हूँ, वहाँ मैं एक प्रतिष्ठित कंपनी में सुपरवाइजर हूँ. मेरी अच्छी पगार है. ८ घंटे की जाब है. हफ्ते में ५ दिन काम होता है.

 

 

 

कंपनी का मालिक राजस्थान का है. उसके विचार बहुत ही अच्छे हैं. किसी के उपर कोई दबाव नहीं देता है, पूरी कंपनी एक टीम की तरह काम करती है. साल में २ महीने की छुट्टी मिलती है और उस छुट्टी के पैसे भी नहीं काटे जाते हैं अर्थात पेड हॉलीडे.

 

 

 

दोस्तों इस बार मै जून लास्ट में घर आया था, मेरे एक दोस्त की शादी थी. वह मेरा बहुत ही खास मित्र था. मेरे और उसके का फासला तो बहुत ज़्यादा था, लेकिन दोनो दिलों के बीच में कोई दूरी नहीं थी. मेरे और उसके घर के बीच की दूरी १० किलोमीटर की थी, इसके बावजूद हमारे और उसके घर के बीच के संबंध बहुत ही प्रगाढ़ थे.
जुलाई के पहले सप्ताह में उसकी शादी थी. इस बार शादी के मुहूर्त लेट तक थे. मै घर जिस दिन पहुँचा भाईसाहब पूरे परिवार के साथ घर पर पहुँच गये और उसी दिन मुझे शाम तक अपने घर भी लेकर चले गये. चलिए अब इन भाईसाहब का नाम भी बता ही देता हूँ,इनका नाम था अमित त्रिपाठी.
पूरी रात मैं वहीं रुका. मेहमान की तरह सेवा सत्कार हुआ. मैं बार-बार कहता रह गया कि घर का ही लड़का हूँ, लेकिन जब कोई माने तब ना. सुबह मैं घर के लिए प्रस्थान करने वाला था कि भाईसाहब का आदेश हो गया कि कल सुबह चले आना बाइक के साथ, एक मेहमान के यहां जाना है और वहाँ दो दिन के लिए रुकना है. उनके घर पर कोई कार्यक्र्म है. मैने भी हाँ में सर हिलाया और वहाँ से प्रस्थान किया.
अगले दिन मैं समय से उनकी घर पहुँच गया, लेकिन भाईसाहब पहले की तरह लेट-लतीफ, मैं ज़ोर से आवाज दिया…ओये अमित भैया…अमित त्रिपाठी जी.
आवाज सुनकर माँ जी बाहर आईं और बोलीं आ जाओ बेटा घर में आ जाओ, थोड़ा पानी पी लो, ओकर तो पहले सी आदत है, कितना भी जरूरी काम हो, टाइम से नहीं जा सकता.
मैं घर में आया पानी पिया, तब तक अमित भी तैयार होकर आ गया. हमने मंज़िल की ओर प्रस्थान किया. हम जहाँ जा रहे थे वह अमित के घर से करीब ६ किलोमीटर की दूरी पर था और मेरे घर से १६ किलोमीटर की दूरी पर.
करीब १५ मिनट में हम वहाँ पहुँच गये. अमित ने सभी से मेरा परिचय कराया. उनके यहाँ गृहपरवेश का कार्यक्रम था. दिन भर हम लोग मेहमानों की आवभगत में जुटे रहे.
उस दिन हल्की -हल्की बारिश हुई थी. शाम के समय बाकी लोग तो घर की छतों पर सो गये लेकिन हम दोनो लोग बाहर बरामदे मे सो गये.

 

 

 

” बारिश की बूंदे, बूँदों का पानी ……. तू रंग सरबतों का..मैं मीठे घाट का पानी” , गीतों के बोल, वह भी इतने मधुर आवाज में, मैं चौंक कर उठ गया, मैने समय देखा तो सुबह की ४.३० बज रहे थे.
हल्की -हल्की बारिश हो रही थी, बिजली कड़क रही थी और उसी के बीच इतना कर्णप्रिय गीत. मेरा तो दिल ही आ गया. मैं उसी पल यह जानने को बेताब हो रहा था कि आख़िर वह सुरों की मल्लिका है कौन?

 

 

 

मैं उसे ढूढ़ने के लिए जाने वाला ही था कि अमित की नीद भी खुल गयी. उसने मुझसे कहा बे क्या कर रहा है. उल्लू की तरह रात भर जागते रहता है. कभी सो भी लिया कर.
तभी वह स्वर राग फिर से सुनाई दिया…ये मोह-मोह के धागे... वह भी चौंक पड़ा और बोला बे बज कितना रहा है…मैने उसका चेहरा देखा तो उसके १२ बजे हुए थे.
मैने उससे पूछा भाई के हो गया….. वह घबराकर बोला बे बकैती बंद कर समय बता.
भाई सुबह हो गयी है, ५ बजाने वाले हैं. मुंबई में तो लोग अब तक ड्यूटी के लिए निकल जाते हैं. तब जाकर उसने राहत की सांस ली और बोला भाई मुझे तो लगा की कोई चुड़ैल तो नहीं है.
फिर हमलोग टार्च लेकर उस हसीना को ढूढ़ने निकल पडे, गली-गली भटके, गाँव में लगभग हर जगह ढूँढा वो नहीं मिली. हवा के झोको के साथ ही उसकी स्वरलहरी भी हर दिशाओं से आती प्रतीत होने लगती थी. हम उसे ढूंढते सड़क के उस पार पहुँचे कि ” तुझसे लागी मेरे मन की लगन ” की ध्वनि काफ़ी करीब महसूस हुई.
हमारी नज़रें भी उसी तरफ घूमीं … उस राजकुमारी को एक टक देखता रह गया. मेरा बावरा मन अब उसकी गिरफ़्त में हो चुका था, वह दौड़ कर सड़क के उस पार बने घर में चली गयी.
सड़क के उस पार बना वह इकलौता घर था. घर तो काफ़ी आलीशान था, लेकिन उसी घर से एक लड़की का विलाप कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहा था. मैने उसी समय अमित से पूछा … भाई यह घर किसका है तू बता सकता है.

नहीं भाई…इसके बारे में मुझे तो नहीं पता है, लेकिन तू इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है. कहीं तुझे प्यार- व्यार तो नहीं हो गया. अगर हो भी गया हो ना बेटा तो भूल जइयो, वह खुद किसी के प्यार में फँसी लग रही थी. भाई बदनाम हो जाएगा.

 

 

 

चुप कर…. कुछ तो बात है, तू खाली पता कर उस घर के बारे में, कुछ तो गलत हो रहा है उस लड़की के साथ…. मैने अमित से कहा.
” मैंने ही गलती की… मुझे तुझे यहाँ लेकर आना ही नहीं चाहिए था. अरे क्यों हम किसी के मामले में दखल दें “. अमित ने कहा
वाह क्या बात कही तूने…शाबाश.. तुझे तो मैडल मिलना चाहिए..मत पड़ तू किसी के बीच में. मैं खुद पता कर लूँगा. मैंने भी गुस्से में कहा और फिर हम वहाँ से निकल पड़े.
कुछ देर के बाद अमित ने कहा…चलो ठीक  है. मैं कल पता लगाता हूँ.
हम जब तक घर पहुँचते यहां सब लोग जाग गये थी और हमें खोजने की तैयारी की जा रही थी. मै हालत को देखते ही सब समझ गया और तुरंत   बोला.
क्षमा कीजिए हम लोगटहलने गये थे, मुंबई में भी जाता था तो वही आदत है. मुझे लगा कि हम जल्द आ जाएंगे, इसलिए हमने किसी को जगाया नहीं.
दरअसल हम टहलते- टहलते सड़क तक चले गये , वहां हमें एक मधुर आवाज सुनाई ने, जब उस तरफ आगे बढ़े तो देखा किएक २०-२२ साल की लड़की यह गीत गा रही थी और उसके आखों से आँसू बह रहे थे… हमारी आहट पाकर वह तुरंत वहां से हट गयी और 
सामने बने आलीशान घर में चली गयी.
हम रास्ते भर इसी की चर्चा कर रहे थे कि इतने आलीशान घर की लड़की इस तरह बेबश और लाचार कैसे है. आख़िर क्या हुआ है उसके साथ?
हम इस बात के एक बार फिर से क्षमा मांग रहे हैं…हमें बता कर ही जाना चाहिए था. लेकिन कृपया हमें कोई तो उसके बारे में बताये. यह बात सुनकर वहां एक खामोशी छा गयी और सबके चेहरे गमगीन हो गये.
तब एक बुजुर्ग ने कहा बेटा बड़ी लंबी कहानी है…जा पहले तैयार हो जा फिर मैं तुझे सब कुछ बताता हूँ. फिर सभी लोग अपने-अपने कार्य में लग गये.
लेकिन मुझे वह चेहरा, उस चेहरे की उदासी अंदर ही अंदर परेशान कर रही थी. मैं और अमित दोनो ही फटाफट तैयार होकर दादाजी के पास आ गये. अमित भी पूरी कहानी जानने को बेचैन हो रहा था. घर के कुछ अन्य सदस्य भी आ गये. हालांकि उन्हें सारी घटनाओं की जानकारी थी.
दादाजी ने कहा कि वह रश्मि थी. उसके पिताजी सेना में कर्नल थे. नसीब की मारी है बेचारी, भगवान ऐसी नसीब दुश्मन को भी ना दें. जब वह मात्र ३ वर्ष की थी उसकी मां का देहांत हो गया.
इतने कम उम्र में मां का साया सर से हट जाने से वह परेशान रहनी लगी. घर में उसके दादाजी को छोड़कर उसे कोई लाड़ प्यार नहीं करता था.
इसी बीच उसके पिता रमेश पांडे के किसी रिश्तेदार ने उनके लिए रिश्ता लेकर आए. रमेश इसके खिलाफ था लेकिन उसकी मां ने ज़िद करके रिश्ता कर दिया. रमेश को भी लगा कि रश्मि को एक मां मिल जाएगी.
लेकिन हुआ उसके ठीक उल्टा, घर में आई नई बहू प्रमिला, रश्मि को नापसंद करने लगी, हद तो तब हो गयी जब प्रमिला को एक पुत्र हुआ. उसके बाद रश्मि उस घर की एक नौकरानी बन कर रह गयी.
रमेश और रश्मि के पिता की ज़िद के बाद रश्मि को स्कूल भेजा जाने लगा. वह पढ़ने में बहुत ही अच्छी थी. इसी बीच उसके दिल में किसी और की दस्तक हुई और धीरे-धीरे उस अजनबी ने उसके दिल पर कब्जा कर लिया.. वह भी उसी स्कूल में पढ़ता था. वह उससे बहुत अधिक प्यार करने लगी थी. उसका नाम विहान था.
समय बिता रश्मि ने १०वीं बहुत ही अच्छे नंबर से पास किया. इधर विहान भी १०वी पास कर लिया.. फिर दोनो एक साथ एक ही कालेज में दाखिला लिया. रश्मि, रमेश से कुछ नहीं छुपाती थी. उसने रमेश से विहान के बारे सब कुछ बता दिया. रमेश भी इस बात से सहमत हो गया था.

लेकिन इसी बीच एक घटना हुई, जिसने रश्मि के प्रत्येक सपने को चकनाचूर कर दिया. रश्मि का एक वीडियो वायरल हुआ, जो समाज के दृष्टि से बहुत ही आपत्तिजनक था.

 

 

 

इस वीडियो के वायरल होते ही उसके जिंदगी में भूचाल आ गया. इस सदमें को उसके दादाजी बर्दास्त नहीं कर सके और उनकी तबीयत बिगड़ती चली गयी… कुछ दीनो में उनकी मृत्यु हो गयी.

 

 

 

इधर एक आतंकवादी हमले में रमेश भी शहीद हो गये. रमेश के शहीद होने के बाद रश्मि की बची उम्मीदें भी धूमिल हो गयी. विहान भी उस कालेज को छोड़ दिया.

 

 

 

वह एक अमीर खानदान से ताल्लुक रखता है. उसने यह खबर उड़ा दिया की पैसे की लालच में रश्मि ने ही उसके साथ यह गलत हरकत की थी और यह वीडियो बनाया. तब से रश्मि कहीं बाहर नहीं निकलती. वह ही रोज उस पेड़ के पास आकर अपने दुख को साझा करती है.

 

 

 

यह सुनकर वहां सबके आँखों में आँसू थे… तभी शोरगुल सुनाई देने लगा..सभी लोग रश्मि के घर की ओर दौड़ रहे थे….हम लोग भी तेज़ी से उस ओर दौड़े……हमने देखा की रश्मि जिंदगी की जंग हार गयी थी…उसने मृत्यु का वरण कर लिया था.

यह देख दादाजी बोली…मुक्त हो गयी….इस दुख के पहाड़ से…………!!

 

 

 

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