Poem in Hindi मेरे जीने की आस जिंदगी से कोसो दूर चली गयी थी कि अब मेरा कौन है? मैं किसके लिए अपना आँचल पसारुंगा ? पर देखा-लोक-लोचन में असीम वेदना …
तब मेरा ह्रदय मर्मान्तक हो गया , फिर मुझे ख्याल आया …अब मुझे जीना होगा , हाँ अपने स्वार्थ के लिए न सही… परमार्थ के लिए ही, मैं ज़माने का निकृष्ट था तब देखा उस सूर्य को कि वह निःस्वार्थ भाव से कालिमा में लालिमा फैला रहा है … तो क्यों न मैं भी उसके सदृश बनूं .
भलामानुष वन सुप्त मनुष्यत्व को जागृत करुं। मैं शैने-शैने सदमानुष के आँखों से देखा-लोग असहा दर्द से विकल है उनपर ग़मों व दर्दों का पहाड़ टूट पड़ा है और चक्षुजल ही जलधि बन पड़ी हैं फिर तो मैं एक पल के लिए विस्मित हो गया …
मेरा कलेजा मुंह को आने लगा…परन्तु दुसरे क्षण वही कलेजा ठंडा होता गया और मैंने चक्षुजल से बने जलधि को रोक दिया .. क्योंकि तब तक मैं भी दुनिया का एक अंश बन गया था .
जब तक मेरी सांसें चली.. तब तक मैं उनके लिए आँचल पसारा …… किन्तु अब मेरी साँसे लड़खड़ाने लगी हैं , जो मैंने उठाए थे ग़मों व दर्दों के पहाड़ से भार को वह पुनः गिरने लगा है .
गुमराह हूं कोई राह बता दो।
मुझे भी साथले चलो मानवताकी डगर पे।।
सत्य -अहिंसाकेपुजारी हैं।।
हो गर हाहाकार तो सिमटा देते है।।
जो बांधकर जकड सके।
पथ मे कोई विध्न नही
जो रोककर अ क ड सके।।
जीत ले जो प्रेम वही खिलाडी।।
यहां मजहब न भेदभाव,सर्व धर्म समभाव से जिया …है।
फिर तो स्वर्ग यहीं है नर्क यहीं है।
मानव मानव ही है सोच का फर्क है।।
न हताश हो न निराश हो।
मन मे आश व विश्वास हो।।
जीवन -ज्योत जला दे ।
मानवता के डगर को स्वर्ग सा सजा दे।।
भारत – भारती के जन जन को बता दे।
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